
बिहार के एक छोटे से गाँव ‘रामपुर’ में, जहाँ बिजली भी मेहमान की तरह आती थी, वहां एक टूटी-फूटी झोपड़ी में आर्यन रहता था। आर्यन के पिता एक गरीब किसान थे जो दिन भर दूसरों के खेतों में मजदूरी करके बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे।
बचपन से ही आर्यन को आसमान के तारे देखने का बहुत शौक था। वह अक्सर अपनी माँ से पूछता, “माँ, क्या मैं उन तारों को छू सकता हूँ?” माँ हँस कर कहती, “बेटा, वो बहुत दूर हैं, वहां जाने के लिए बहुत बड़ा आदमी बनना पड़ता है।” उस दिन आर्यन ने अपनी माँ की उस बात को अपने दिल में बैठा लिया—उसे ‘बड़ा आदमी’ बनना था।
संघर्ष की शुरुआत जैसे-जैसे आर्यन बड़ा हुआ, किताबों से उसका प्यार बढ़ता गया। लेकिन गरीबी उसके रास्ते का सबसे बड़ा पहाड़ थी। आठवीं कक्षा के बाद पिता ने कहा, “बेटा, अब मेरे पास तुम्हें पढ़ाने के पैसे नहीं हैं। तुम मेरे साथ खेत में हाथ बटाओ।” आर्यन रोया नहीं, उसने बस इतना कहा, “पिताजी, मैं दिन में खेत में काम करूँगा और रात में पढ़ाई।”
आर्यन दिन भर पसीना बहाता और रात को केरोसिन के दीये की मद्धम रोशनी में गणित के सवाल हल करता। कई बार तेल खत्म हो जाता, तो वह गाँव के एकमात्र स्ट्रीट लाइट के नीचे जाकर पढ़ता, जहाँ मच्छर उसे काटते रहते, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ किताबों में होता। गाँव के लोग उसका मजाक उड़ाते, “देखो, खेत में काम करने वाला वैज्ञानिक बनेगा!” लेकिन आर्यन खामोश रहा। उसकी खामोशी उसका जवाब थी।
मुसीबतों का पहाड़ 12वीं की परीक्षा पास आई, लेकिन आर्यन के पास किताबों के पैसे नहीं थे। उसने रद्दी की दुकान से फटी-पुरानी किताबें खरीदीं और उन्हें टेप से चिपकाकर पढ़ा। जिस दिन रिजल्ट आया, पूरा जिला हैरान था। आर्यन ने टॉप किया था। उसे शहर के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में स्कॉलरशिप मिल गई।
लेकिन शहर का जीवन गाँव से भी ज्यादा कठिन था। उसके पास अच्छे कपड़े नहीं थे, अंग्रेजी बोलना नहीं आता था। अमीर बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे। कई बार उसने सिर्फ पानी पीकर रातें गुजारीं क्योंकि मेस की फीस देने के लिए पैसे नहीं थे। वह टूट सकता था, वापस गाँव जा सकता था, लेकिन उसे माँ को दिया गया वचन याद था—”तारों को छूना है।”
सफलता की उड़ान कॉलेज के बाद, उसने ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की प्रवेश परीक्षा दी। लाखों बच्चों में से कुछ गिने-चुने चुने गए, और उनमें एक नाम था—आर्यन कुमार।
सालों की मेहनत रंग लाई। वह लड़का, जिसके घर में कभी बिजली नहीं थी, आज भारत के सबसे बड़े ‘सैटेलाइट मिशन’ का हिस्सा था। जिस दिन रॉकेट लॉन्च हुआ, पूरा देश टीवी पर देख रहा था। जैसे ही रॉकेट ने आसमान का सीना चीरकर अंतरिक्ष में प्रवेश किया, आर्यन की आँखों में आँसू आ गए। उसे वो स्ट्रीट लाइट, वो टूटी झोपड़ी और पिता का पसीने से लथपथ चेहरा याद आ गया।
लॉन्च के बाद जब मीडिया ने उससे पूछा कि आपकी सफलता का राज क्या है? तो आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं रोया, मैं भूखा रहा, मैं गिरा… लेकिन मैं कभी रुका नहीं।”
आज आर्यन गाँव के बच्चों के लिए एक प्रेरणा है। उसने साबित कर दिया कि अगर हौसलों में जान हो, तो मिट्टी के घर से निकलकर भी मंगल तक पहुँचा जा सकता है।
💡 कहानी की सीख (Moral)
“सफलता सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। अगर आपके पास जूनून है, तो आप दुनिया की हर मुसीबत को सीढ़ी बनाकर अपनी मंजिल तक पहुँच सकते हैं।”


