विक्रम ने अपने नए घर के लिए बाज़ार से एक प्राचीन (Antique) आईना खरीदा। आईना बहुत खूबसूरत था, जिसके चारों तरफ नक्काशी की गई थी। उसने उसे अपने बेडरूम में लगाया। पहले कुछ दिन सब ठीक रहा, लेकिन फिर विक्रम को एक अजीब वहम होने लगा।
जब भी वह आईने में देखता, उसे लगता कि उसकी परछाई (Reflection) उससे एक सेकंड देरी से हिल रही है। जैसे कि वह हाथ हिलाता, तो परछाई एक पल बाद हाथ हिलाती। विक्रम को लगा कि शायद उसे थकान की वजह से ऐसा लग रहा है।
एक रात, विक्रम नींद से जागा क्योंकि उसे प्यास लगी थी। जैसे ही वह बिस्तर से उठा, उसकी नज़र आईने पर पड़ी। आईने में उसका अक्स (परछाई) अभी भी बिस्तर पर लेटा हुआ था और उसे घूर रहा था, जबकि असली विक्रम खड़ा था! विक्रम डर के मारे पीछे हट गया। आईने में लेटी हुई परछाई धीरे से उठी और विक्रम की तरफ देखकर मुस्कुराने लगी—एक ऐसी मुस्कान जो कानों तक फटी हुई थी।
परछाई ने अपना हाथ आईने की सतह पर रखा और धीरे-धीरे आईने से बाहर निकलने लगी। विक्रम ने पास पड़ा एक भारी फूलदान उठाया और पूरी ताकत से आईने पर दे मारा। आईना चकनाचूर हो गया। विक्रम ने राहत की साँस ली। लेकिन जब उसने नीचे फर्श पर बिखरे हुए आईने के टुकड़ों को देखा, तो हर एक टुकड़े में वह शैतानी परछाई उसे घूर रही थी और हंस रही थी। उस रात के बाद विक्रम ने अपने घर के सारे शीशे ढक दिए, लेकिन वह परछाई अब भी उसका पीछा करती है—हर उस चीज़ में जहाँ उसका चेहरा दिखता है, चाहे वो खिड़की हो या पानी।
