गुमशुदा ट्रेन नंबर 404

कहानी: साल 1998 की तूफानी रात थी। शिमला से कालका जाने वाली ट्रेन नंबर 404, जिसे “नाइट क्वीन” कहा जाता था, अपने निर्धारित समय पर स्टेशन से निकली। ट्रेन में कुल 50 यात्री और 5 स्टाफ सदस्य थे। ट्रेन को बरोग सुरंग (Tunnel) से गुजरना था, जो महज 3 मिनट का रास्ता था। ट्रेन सुरंग के अंदर गई, लेकिन दूसरी तरफ से कभी बाहर नहीं निकली।

पुलिस, रेलवे और सेना ने हफ्तों तक सुरंग की छानबीन की। न कोई मलबे का निशान मिला, न ही कोई यात्री। ऐसा लगा जैसे पूरी ट्रेन हवा में गायब हो गई हो। फाइल बंद कर दी गई।

ठीक 25 साल बाद, उसी स्टेशन के नए स्टेशन मास्टर, रमेश को आधी रात को एक सिग्नल मिला। एक ट्रेन उसी ट्रैक पर आ रही थी। रमेश हैरान था क्योंकि उस वक्त किसी ट्रेन का शेड्यूल नहीं था। कोहरे को चीरते हुए एक पुरानी, जंग लगी ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। उस पर लिखा था—”404″।

रमेश कांपते हुए ट्रेन के पास गया। अंदर का नजारा देखकर उसके होश उड़ गए। यात्री अपनी सीटों पर बैठे थे, लेकिन वे इंसान नहीं थे—वे केवल कंकाल थे, जिन्होंने 1998 के कपड़े पहने हुए थे। और सबसे भयानक बात यह थी कि ड्राइवर की सीट पर जो कंकाल बैठा था, उसकी कलाई पर बंधी घड़ी अभी भी चल रही थी, लेकिन वह उल्टी दिशा में घूम रही थी। तभी स्टेशन मास्टर के वॉकी-टॉकी पर एक आवाज आई—”रमेश, तुम ट्रेन में क्यों चढ़ रहे हो? यह ट्रेन तो 25 साल पहले ही क्रैश हो चुकी है… और तुम भी उसी में थे!”

रमेश ने घबराकर आईने में देखा—उसे अपना चेहरा नहीं, बल्कि एक कंकाल दिखाई दिया।

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