रिक्शेवाले का बेटा बना IAS: गरीबी की जंजीरें तोड़कर लिखी सफलता की कहानी (Rickshaw Puller’s Son Becomes IAS: A Success Story Written by Breaking Chains of Poverty)


बनारस की तंग गलियों में, चिलचिलाती धूप में, 55 साल के रामू काका अपनी पुरानी साइकिल रिक्शा खींच रहे थे। पसीने से लथपथ उनका शरीर कांप रहा था, लेकिन पैडल रुक नहीं रहे थे। उन्हें पता था कि अगर आज रिक्शा नहीं चला, तो उनके बेटे सूरज की नई किताबों के पैसे नहीं जुड़ पाएंगे।

रामू काका का घर के नाम पर शहर के बाहर एक 10×10 की छोटी सी खोली थी। छत टपकती थी और बिजली तो जैसे मेहमान थी—कभी आती, कभी जाती। लेकिन इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनी हमेशा जलती थी, वो थी सूरज की आँखों में ‘कलेक्टर’ बनने का सपना।

अंधेरे से जंग सूरज पढ़ाई में बहुत होशियार था, लेकिन गरीबी उसके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा थी। एक रात, जब सूरज अपनी UPSC की तैयारी कर रहा था, अचानक बिजली चली गई। इन्वर्टर तो दूर, घर में मोमबत्ती खरीदने के भी पैसे नहीं थे।

सूरज उदास होकर बैठ गया। रामू काका ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, अमीर के घर में लाइट जाती है तो वो जनरेटर चलाते हैं, गरीब के घर लाइट जाती है तो वो खुद को जलाते हैं। तू रुक मत।”

पिता की बात दिल पर लगी। सूरज ने अपनी किताबें उठाईं और घर से बाहर निकल गया। वह सड़क के किनारे लगी स्ट्रीट लाइट (Street Light) के नीचे जाकर बैठ गया। गाड़ियां गुजर रही थीं, शोर हो रहा था, मच्छर काट रहे थे, लेकिन सूरज का ध्यान सिर्फ अपनी किताब के पन्नों पर था। उस दिन के बाद, स्ट्रीट लाइट ही उसका स्टडी रूम बन गई।

पिता का बलिदान परीक्षा पास आई तो कोचिंग के नोट्स के लिए 5000 रुपये की जरूरत पड़ी। रामू काका के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने चुपचाप अपनी शादी की निशानी—एक पुरानी घड़ी—बाजार में बेच दी। जब सूरज को पता चला, तो वह रो पड़ा। उसने कसम खाई कि इस बलिदान को बेकार नहीं जाने देगा।

लोग रामू काका का मजाक उड़ाते, “अरे रामू, क्यों बेटे को फंसा रहा है? रिक्शा चलवा, दो पैसे घर में आएंगे। कलेक्टर बनना अमीरों का खेल है।” रामू काका बस मुस्कुरा देते और कहते, “मेरा बेटा रिक्शा नहीं, देश चलाएगा।”

फैसले की घड़ी सालों की तपस्या के बाद रिजल्ट का दिन आया। साइबर कैफे में सूरज कांपते हाथों से अपना रोल नंबर टाइप कर रहा था। बाहर रामू काका नंगे पैर खड़े थे, भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

जैसे ही स्क्रीन खुली, सूरज की चीख निकल गई। उसने दौड़कर बाहर आकर पिता के पैर पकड़ लिए और फूट-फूट कर रोने लगा। “बाबूजी, आपका सपना पूरा हुआ! मेरी 24वीं रैंक आई है। अब मैं IAS अधिकारी बन गया हूँ।”

रामू काका की आँखों से आँसू नहीं रुक रहे थे। उन्होंने बेटे को गले लगाया और कहा, “आज तक लोग मुझे रिक्शेवाला कहते थे, लेकिन कल से लोग मुझे ‘साहब का पिताजी’ कहेंगे।”

सूरज की सफलता ने साबित कर दिया कि सुविधाएँ इंसान को नहीं बनातीं, बल्कि इंसान का हौसला सुविधाओं को बौना कर देता है। स्ट्रीट लाइट के नीचे पड़ा वो काला साया, आज जिले का सबसे चमकता सितारा बन चुका था।


💡 कहानी की सीख (Moral)

“अगर तुम्हारे पास सूरज की तरह जलने का हौसला है, तो कोई भी अंधेरा तुम्हारी सफलता को रोक नहीं सकता। गरीबी बहाना नहीं, एक प्रेरणा है।”

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