बनारस की वो शाम: एक अधूरी मुलाकात (That Evening in Banaras: An Incomplete Meeting)

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रवि, जो मुंबई का एक मशहूर फोटोग्राफर था, अक्सर नई जगहों की तलाश में रहता था। लेकिन उसे सुकून सिर्फ बनारस के घाटों पर मिलता था।

एक शाम, जब वह ‘दशाश्वमेध घाट’ पर गंगा आरती की तस्वीरें ले रहा था, उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। उसने साधारण सी गुलाबी साड़ी पहनी थी और दीये को गंगा में प्रवाहित कर रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी थी। रवि ने बिना सोचे उसकी एक तस्वीर ले ली।

शटर की आवाज़ सुनकर लड़की ने मुड़कर देखा। रवि घबरा गया, “माफ़ करना, वो रौशनी बहुत अच्छी थी, तो मैंने…” लड़की मुस्कुरा दी। “कोई बात नहीं। क्या आप तस्वीरें ही लेते हैं या घाट की खूबसूरती महसूस भी करते हैं?”

उस शाम दोनों वहीँ सीढ़ियों पर बैठ गए। उन्होंने घंटो बातें कीं—जिंदगी के बारे में, सपनों के बारे में। लेकिन अजीब बात यह थी कि दोनों ने एक-दूसरे का नाम तक नहीं पूछा। उन्हें लगा कि यह पल यहीं ठहर जाएगा। जाते वक्त लड़की ने कहा, “मेरा नाम सिया है, और मैं कल हमेशा के लिए लंदन जा रही हूँ।”

रवि कुछ कह पाता, उससे पहले ही वह भीड़ में कहीं खो गई। रवि के पास न उसका नंबर था, न पता। बस कैमरे में कैद उसकी एक तस्वीर थी।

5 साल बाद… मुंबई में रवि की फोटोग्राफी प्रदर्शनी (Exhibition) लगी थी। पूरे हॉल में भीड़ थी, लेकिन रवि की नज़र एक तस्वीर पर टिकी थी जिसका नाम था—“द सोल ऑफ़ बनारस” (बनारस की आत्मा)। यह उसी लड़की की तस्वीर थी।

तभी रवि ने देखा कि एक महिला उसी तस्वीर के सामने खड़ी होकर रो रही है। रवि धीरे से उसके पीछे गया और बोला, “तस्वीर अच्छी है, पर असली इंसान ज्यादा खूबसूरत था।”

महिला ने मुड़कर देखा। वो सिया थी। “तुम्हें लगा मैं वो शाम भूल गयी?” सिया ने नम आँखों से पूछा। रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने उस शाम को ही अपनी जिंदगी बना लिया था।”

उस दिन रवि को समझ आया कि सच्ची मोहब्बत के लिए साथ रहना जरूरी नहीं, बस एक-दूसरे को याद रखना ही काफी है। लेकिन किस्मत उन्हें फिर मिला चुकी थी, इस बार कभी न बिछड़ने के लिए।


💡 कहानी का संदेश (Moral)

“सच्चे रिश्ते वक्त और दूरी के मोहताज नहीं होते। अगर दो लोग एक-दूसरे के लिए बने हैं, तो कुदरत उन्हें मिलाने का रास्ता निकाल ही लेती है।”

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