
पंजाब के एक छोटे से गाँव के धूल भरे मैदान में, 10 साल का आर्यन खड़ा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक सपना था—हवा से बातें करने का, दौड़ने का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। उसके दोनों पैरों में लोहे के भारी कैलिपर्स (braces) बंधे हुए थे। बचपन में हुए पोलियो ने आर्यन से उसके बचपन की दौड़ छीन ली थी।
गाँव के स्कूल में जब भी दौड़ प्रतियोगिता होती, आर्यन दर्शकों की भीड़ में सबसे पीछे खड़ा होता। बच्चे उसे चिढ़ाते थे, “अरे ओ लंगड़े! तू क्या दौड़ेगा? तेरे बस का नहीं है।” ये शब्द आर्यन के दिल पर हथौड़े की तरह लगते थे। वह घर आकर बहुत रोता। उसकी माँ उसे गले लगाकर कहती, “बेटा, लोगों की बातों पर ध्यान मत दे। भगवान ने अगर एक रास्ता बंद किया है, तो दूसरा जरूर खोला होगा।”
जिद्द की शुरुआत आर्यन के अंदर एक जिद्द थी। एक ऐसी जिद्द जो तूफानों से भी टकराने का माद्दा रखती थी। उसे लगता था कि वह एक ऐसा परिंदा है जिसके पंख टूट गए हैं, लेकिन उड़ने का हौसला अभी बाकी है।
उसने तय किया कि वह दौड़ेगा। उसने किसी को बताए बिना, रोज़ सुबह 4 बजे उठकर गाँव के बाहर वाले मैदान में जाना शुरू किया। शुरुआत बहुत दर्दनाक थी। वह दो कदम चलता और गिर पड़ता। घुटने छिल जाते, खून निकलता, दर्द से चीख निकल जाती। कैलिपर्स का वजन उसे जमीन पर धकेल देता था। लेकिन गिरने के बाद वह हर बार फिर खड़ा होता। वह रोता था, लेकिन रुकता नहीं था।
गुरु का मिलना एक दिन, गाँव से गुजर रहे एक पूर्व आर्मी एथलीट, सूबेदार विक्रम सिंह की नज़र उस लड़के पर पड़ी जो गिर-गिर कर भी दौड़ने की कोशिश कर रहा था। विक्रम सिंह ने उसकी आँखों में वो ‘आग’ देखी जो चैंपियंस में होती है।
वे आर्यन के पास गए और बोले, “बेटा, तुम्हारे पैर कमजोर हो सकते हैं, लेकिन तुम्हारा इरादा लोहे का है। क्या तुम मेरे साथ ट्रेनिंग करोगे?” उस दिन आर्यन को सिर्फ एक कोच नहीं, एक नई उम्मीद मिली थी।
संघर्ष का सफर ट्रेनिंग आसान नहीं थी। यह नरक जैसी थी। कोच विक्रम सिंह ने उसे सिखाया कि दौड़ पैरों से नहीं, जिगर से जीती जाती है। सालों की कड़ी मेहनत, पसीना, और अनगिनत रातों का दर्द—आर्यन ने सब सहा। कई बार लगा कि अब और नहीं होगा, अब छोड़ देना चाहिए। लेकिन फिर उसे उन लोगों के ताने याद आते जिन्होंने उसे ‘नाकारा’ कहा था।
धीरे-धीरे, वह ‘लंगड़ा लड़का’ जिला स्तर पर, फिर राज्य स्तर पर और फिर राष्ट्रीय स्तर पर पैरा-एथलीटों (Para-athletes) के बीच अपनी पहचान बनाने लगा।
ओलंपिक का सपना और फिर वह दिन आया, जिसका सपना उसने उस धूल भरे मैदान में देखा था। पैरालंपिक खेलों (Paralympics) का फाइनल स्टेडियम। दुनिया भर के बेहतरीन धावक ट्रैक पर थे। स्टेडियम की रोशनी आँखों को चुंधिया रही थी।
रेस शुरू होने से ठीक पहले, आर्यन के पोलियो वाले पैर में एक तीखा दर्द उठा। उसे लगा वह गिर जाएगा। घबराहट ने उसे घेर लिया। तभी उसने आँखें बंद कीं और अपनी माँ का चेहरा याद किया। उसे कोच के शब्द याद आए: “तू टूटा हुआ नहीं है आर्यन, तू बस अलग है। और अलग लोग ही इतिहास रचते हैं।”
आखिरी उड़ान गनशॉट हुआ। आर्यन दौड़ा। उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। दर्द भूल गया, दुनिया भूल गया। वह सिर्फ फिनिश लाइन को देख रहा था। हवा उसके कानों में सीटी बजा रही थी। और जब उसने वो लाइन पार की, तो स्टेडियम तालियों से गूंज उठा।
वह ‘जिद्दी परिंदा’ आज उड़ गया था। उसने गोल्ड मेडल जीता था। पोडियम पर खड़े होकर जब राष्ट्रगान बजा और उसके गले में मेडल पहनाया गया, तो उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। ये आँसू दर्द के नहीं, जीत के थे। उसने साबित कर दिया था कि अगर हौसलों में जान हो, तो टूटे पंखों से भी आसमान छुआ जा सकता है।
💡 कहानी की सीख (Moral)
“परिस्थितियां आपको दिव्यांग नहीं बनातीं, आपकी सोच बनाती है। अगर आपके अंदर ‘जिद्द’ और ‘जुनून’ है, तो दुनिया की कोई भी शारीरिक कमी आपको आपकी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।”


