डर के आगे जीत: मंच पर कांपने वाला लड़का कैसे बना देश का बड़ा मोटिवेशनल स्पीकर (Victory Beyond Fear: How a Boy Who Trembled on Stage Became the Country’s Top Motivational Speaker)

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दिल्ली के एक कॉलेज के खचाखच भरे ऑडिटोरियम में, जब 30 साल के आर्यन मल्होत्रा माइक थामने के लिए स्टेज पर चढ़े, तो 5000 से ज्यादा छात्रों ने खड़े होकर तालियां बजाईं। आर्यन के चेहरे पर एक गजब का आत्मविश्वास था, उसकी आवाज़ में एक जादू था जो सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर देता था।

लेकिन कोई नहीं जानता था कि आज जो शेर की तरह दहाड़ रहा है, वह कभी ‘भीगी बिल्ली’ हुआ करता था।

आर्यन की कहानी 12 साल पहले शुरू हुई थी। वह पढ़ाई में तो बहुत होशियार था, लेकिन उसे एक बहुत बड़ी समस्या थी—ग्लोसोफोबिया (Glossophobia), यानी पब्लिक स्पीकिंग का डर। क्लास में अगर टीचर उसे खड़ा करके कुछ पूछ लेते, तो उसके हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते, हलक सूख जाता और आवाज़ गले में ही अटक जाती।

जिंदगी का सबसे बुरा दिन 11वीं क्लास में, स्कूल के वार्षिकोत्सव (Annual Function) में उसे जबरदस्ती एक छोटी सी स्पीच देने के लिए चुना गया। आर्यन ने बहुत रट्टा मारा। लेकिन जिस पल वह स्टेज पर पहुँचा और सामने सैकड़ों लोगों के चेहरे देखे, उसका दिमाग सुन्न पड़ गया।

माइक के सामने खड़ा होकर वह 2 मिनट तक कुछ नहीं बोल पाया। सिर्फ पसीना पोंछता रहा और कांपता रहा। पूरा हॉल जोर-जोर से हंसने लगा। किसी ने पीछे से चिल्लाया, “अरे, गूंगा है क्या?” आर्यन रोते हुए स्टेज से नीचे भागा और सीधा घर जाकर अपने कमरे में बंद हो गया। उस दिन उसने कसम खाई कि अब वह कभी किसी मंच पर नहीं चढ़ेगा।

बदलाव की शुरुआत महीनों तक आर्यन डिप्रेशन में रहा। उसे लगता था कि वह किसी काम का नहीं है। एक दिन, उसने टीवी पर एक इंटरव्यू देखा। एक मशहूर वक्ता कह रहा था, “डर सबको लगता है, गला सबका सूखता है। लेकिन जो डर के बावजूद कदम बढ़ाता है, वही बाजीगर कहलाता है।”

इस एक लाइन ने आर्यन की सोई हुई हिम्मत को जगा दिया। उसने सोचा, “मैं अपनी पूरी जिंदगी इस डर के साए में नहीं बिता सकता। मुझे इससे लड़ना होगा।”

डर से दोस्ती आर्यन ने ठान लिया कि अब वह भागेगा नहीं। उसने शुरुआत की—अपने कमरे के आईने से। वह रोज आईने के सामने खड़ा होकर खुद से बातें करता, स्पीच देता। उसकी आवाज़ कांपती, वह हकलाता, लेकिन वह रुकता नहीं था।

फिर उसने अपने मोबाइल में अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करना शुरू किया। अपनी ही कांपती आवाज़ सुनकर उसे शर्म आती थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने छोटे-छोटे डिबेट कॉम्पिटिशन में नाम देना शुरू किया। वहां भी वह कई बार फेल हुआ, लोगों ने मजाक उड़ाया, लेकिन अब उसे फर्क पड़ना बंद हो गया था। उसे समझ आ गया था कि ‘बेइज्जती’ सफलता की फीस है, जो चुकानी ही पड़ती है।

सबसे बड़ा इम्तिहान कॉलेज के फाइनल ईयर में, एक नेशनल लेवल का ‘पब्लिक स्पीकिंग कॉन्टेस्ट’ हुआ। आर्यन ने अपना नाम दिया। फाइनल के दिन, जब उसका नाम पुकारा गया, तो उसका दिल आज भी वैसे ही जोर से धड़क रहा था जैसे स्कूल के दिनों में धड़कता था। पैर आज भी कांप रहे थे।

वह स्टेज पर गया। माइक के सामने खड़ा हुआ। सामने हजारों लोग थे। उसने एक गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया।

इस बार उसने कोई रटी-रटाई स्पीच नहीं दी। उसने अपना सच बोला। उसने माइक पर कहा, “सच बताऊँ तो इस वक्त मेरे पैर कांप रहे हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है। लेकिन आज मेरा यहाँ खड़ा होना इस बात का सबूत है कि मेरा हौसला मेरे डर से बड़ा है।”

उसकी ईमानदारी ने सबका दिल जीत लिया। उसने अपने संघर्ष की कहानी सुनाई। जब वह चुप हुआ, तो पूरा हॉल खामोश था, और फिर जो तालियां बजीं, वो रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। उस दिन आर्यन जीत गया था—कॉम्पिटिशन नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर को।

आज आर्यन मल्होत्रा देश के सबसे महंगे और व्यस्त मोटिवेशनल स्पीकरों में से एक है। वह कहता है, “मैं आज भी जब स्टेज पर जाता हूँ तो मुझे डर लगता है। लेकिन अब मैं डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। मैं डर का हाथ पकड़कर साथ चलता हूँ।”


💡 कहानी की सीख (Moral)

“डरना कोई बुरी बात नहीं है। दुनिया के सबसे सफल लोग भी डरते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे डर की वजह से रुकते नहीं हैं, बल्कि डर के बावजूद काम करते हैं। आपकी असली जीत आपके कम्फर्ट ज़ोन (Comfort Zone) के बाहर है।”

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