
मुंबई की तंग और बदबूदार झुग्गियों (Slums) में रहने वाले 14 साल के राजू की सुबह अलार्म से नहीं, बल्कि म्युनिसिपल की कचरा उठाने वाली गाड़ी के शोर से होती थी। राजू का काम था—दिन भर शहर के कूड़ेदानों से प्लास्टिक की बोतलें और रद्दी बीनना। उसके पिता शराबी थे और माँ घरों में बर्तन मांजती थी।
लोग उसे “ए कचरे वाले” कहकर बुलाते थे। राजू के हाथ काले और गंदे रहते थे, लेकिन उसकी आँखों में सपने बहुत साफ़ थे।
कचरे में मिली उम्मीद एक दिन, कचरा बीनते समय उसे एक अमीर घर के बाहर फेंकी हुई कुछ पुरानी कंप्यूटर की किताबें मिलीं। किताबें अंग्रेजी में थीं, जो राजू को ठीक से आती भी नहीं थी। लेकिन उसमें बनी तस्वीरें और कोड्स उसे किसी जादुई मंत्र जैसे लगे। उसने उन किताबों को रद्दी में बेचने के बजाय अपने पास रख लिया।
शाम को वह एक स्थानीय साइबर कैफे के बाहर खड़ा होकर कांच के दरवाज़े से अंदर झांकता रहता था। वह देखता था कि कैसे लोग कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते हैं और स्क्रीन पर रंग-बिरंगी लाइनें (Code) आ जाती हैं।
रेलवे स्टेशन का फ्री वाई-फाई राजू के पास कंप्यूटर नहीं था, लेकिन उसके पास एक टूटी हुई स्क्रीन वाला पुराना स्मार्टफोन था। उसने सुना था कि रेलवे स्टेशन पर वाई-फाई फ्री मिलता है। अब राजू का एक ही रूटीन बन गया—दिन भर कचरा बीनना और रात को रेलवे स्टेशन के एक कोने में बैठकर उन किताबों और यूट्यूब (YouTube) की मदद से ‘कोडिंग’ सीखना।
शुरुआत में उसे कुछ समझ नहीं आया। “HTML क्या है?”, “Python क्या है?”—ये शब्द उसके सिर के ऊपर से निकल जाते। कई बार पुलिस वाले उसे स्टेशन से भगा देते, लोग उसे चोर समझकर शक करते। लेकिन राजू की जिद्द थी कि उसे अपनी जिंदगी बदलनी है। उसने टूटी-फूटी अंग्रेजी सीखी और धीरे-धीरे कोडिंग की भाषा (Language) को समझने लगा।
समस्या का समाधान राजू ने देखा कि उसके जैसे हजारों कचरा बीनने वालों को रद्दी का सही दाम नहीं मिलता। बीच के दलाल (Middlemen) उन्हें लूटते हैं। राजू ने सोचा, “क्यों न मैं एक ऐसा ऐप बनाऊं जो कबाड़ी वालों को सीधे बड़ी रिसाइकिल कंपनियों से जोड़ दे?”
यह विचार पागलपन लग रहा था। एक कचरा बीनने वाला ऐप बनाएगा? लेकिन राजू ने हार नहीं मानी। उसने 6 महीने तक रात-दिन एक कर दिया। वह स्टेशन पर सोता, वहीँ कोड लिखता। हजारों एरर (Errors) आए, लेकिन वह सुधारता रहा।
आखिरकार, उसने एक बेसिक ऐप तैयार किया जिसका नाम रखा—“ScrapLink”।
चमत्कार राजू ने हिम्मत करके शहर के एक ‘Tech Hackathon’ (जहाँ प्रोग्रामर मिलते हैं) में जाने का फैसला किया। वहाँ सूट-बूट पहने बड़े-बड़े इंजीनियर आए थे। फटे कपड़ों में राजू को देखकर सिक्योरिटी गार्ड ने उसे रोका। लेकिन राजू ने विनती की कि उसे सिर्फ 5 मिनट अपनी बात रखने दी जाए।
जब राजू ने स्टेज पर अपना ऐप दिखाया और बताया कि यह कैसे हजारों गरीबों की मदद कर सकता है, तो जज हैरान रह गए। उसका कोड इतना साफ और सुलझा हुआ था कि बड़े-बड़े इंजीनियर भी नहीं लिख पाते।
उस दिन राजू को न सिर्फ फर्स्ट प्राइज मिला, बल्कि एक बड़ी कंपनी ने उसके ऐप में इनवेस्ट करने का ऑफर भी दिया।
नई सुबह आज राजू कचरा नहीं बीनता। वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक है। उसने अपनी बस्ती के बच्चों के लिए एक फ्री कोडिंग स्कूल खोला है। जब मीडिया ने उससे पूछा कि आपने यह कैसे किया, तो राजू ने कहा:
“लोग कचरे में सोना ढूंढते हैं, मैंने कचरे में खुद को ढूंढा। कोडिंग ने मुझे बताया कि अगर आपकी लाइफ में ‘Error’ है, तो उसे ‘Debug’ (ठीक) किया जा सकता है, बस कोशिश करना मत छोड़ो।”
💡 कहानी की सीख (Moral)
“आपकी शुरुआत कहाँ से हुई, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि आप कहाँ जाना चाहते हैं। दुनिया के सबसे नायाब हीरे अक्सर कोयले की खान या कचरे के ढेर में ही मिलते हैं।”


