अधूरा खत और मुकम्मल इश्क

कहानी: जयपुर की गलियों में समीर और आयशा की मोहब्बत मशहूर थी। दोनों बचपन के दोस्त थे। समीर एक लेखक बनना चाहता था और आयशा एक डॉक्टर। वक्त बीतता गया और दोस्ती प्यार में बदल गई। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। आयशा के पिता का तबादला मुंबई हो गया।

जाते वक्त आयशा ने समीर को एक खत दिया और कहा, “इसे तब पढ़ना जब तुम एक बड़े लेखक बन जाओ।” समीर ने वह खत संभाल कर रखा। 5 साल बीत गए। समीर की पहली किताब छपी और वह हिट हो गई। उसने वह खत खोला। उसमें लिखा था, “समीर, अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो तुम अपनी मंजिल पा चुके हो। अब मेरी मंजिल तुम हो। मैं तुम्हारा इंतजार उसी पुराने कैफ़े में करूँगी, हर साल 15 तारीख को।”

समीर कांपते हाथों से उस तारीख को देखा। आज वही 15 तारीख थी। वह भागा और पुराने कैफ़े पहुँचा। वहां कोई नहीं था। वह निराश होकर बैठने ही वाला था कि पीछे से आवाज आई, “लेखक साहब, इतना देर कौन लगाता है?” समीर ने मुड़कर देखा, आयशा खड़ी थी। उसने समीर को गले लगा लिया। उस दिन समीर को समझ आया कि कामयाबी का असली मजा तब है, जब उसे बांटने वाला कोई अपना साथ हो।

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