वो तीसरी दस्तक (The Third Knock)

कहानी: निशांत एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था जो अपनी नाइट शिफ्ट करके घर लौटा। वह अपने फ्लैट में अकेला रहता था। रात के 3 बजे, उसके दरवाजे पर धीमी सी दस्तक हुई। ठक… ठक…

निशांत ने सोचा कि शायद चौकीदार होगा। उसने दरवाजा खोला, लेकिन बाहर कोई नहीं था। उसने गैलरी में देखा, सन्नाटा था। उसने वहम मानकर दरवाजा बंद कर लिया। जैसे ही वह बिस्तर पर बैठा, फिर से आवाज आई। ठक… ठक…

इस बार आवाज दरवाजे से नहीं, बल्कि उसकी अलमारी (Cupboard) के अंदर से आ रही थी। निशांत पसीने से तर-बतर हो गया। उसने पास रखा क्रिकेट बैट उठाया और हिम्मत करके अलमारी का दरवाजा खोला। अंदर सिर्फ उसके कपड़े थे। “शायद चूहा होगा,” उसने खुद को तसल्ली दी।

वह सोने के लिए लेटा और कंबल ओढ़ लिया। तभी, ठीक उसके कान के पास, उसके तकिए के नीचे से आवाज आई। ठक… ठक…

यह आवाज बाहर से नहीं, बल्कि गद्दे के अंदर से आ रही थी। इससे पहले कि निशांत उठ पाता, एक ठंडा हाथ गद्दे को फाड़ते हुए बाहर निकला और उसका गला जकड़ लिया। आखिरी चीज जो निशांत ने सुनी, वह एक फुसफुसाहट थी—”मैंने कहा था न, मुझे जगह चाहिए…”

अगले दिन पुलिस को निशांत की लाश गद्दे के अंदर सिली हुई मिली, और उसके चेहरे पर खौफ जमा हुआ था।

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